हमीदिया अस्पताल में 2 हजार नर्सें, 12 घंटे की ड्यूटी, 5 मिनट का ब्रेक और संभाल रहीं 30 मरीज

Updated on 12-05-2026 12:16 PM

भोपाल। हमीदिया अस्पताल की आइसीयू में सुबह आठ बजे से रात आठ बजे तक ड्यूटी पर खड़ी नर्स जया बरई की पानी की बोतल टेबल पर रखी है। 12 घंटे में शायद ही उसे खोलने का मौका मिले। मेडिकल इमरजेंसी में 12 घंटे ड्यूटी करते हैं, पानी पीने की ड्यूटी आती है तब याद आता है कि बोतल रखी है। पानी पीने का समय ही नहीं मिलता, जया की आवाज में थकान साफ सुनाई देती है।

यह सिर्फ जया की कहानी नहीं है। भोपाल के हमीदिया अस्पताल में 2000 के करीब नर्सें हैं, लेकिन मरीजों की संख्या के सामने ये संख्या नाकाफी है। नियम कहता है कि जनरल वार्ड में 10 मरीजों पर एक नर्स होनी चाहिए। आइसीयू में अगर मरीज कोमा में है तो एक मरीज पर एक नर्स, और होश में है तो दो मरीजों पर एक नर्स। लेकिन हकीकत यह है कि यहां एक नर्स के कंधे पर 30-30 मरीजों की जिम्मेदारी है।

घर नहीं जा पाते, रोने लग जाते हैं

  • नर्सिंग आफिसर जया बरई 19 साल से हमीदिया में हैं। घर अस्पताल से 15 किमी दूर है। घर में समय नहीं दे पाती, छुट्टी भी नहीं मिल पाती। पर्सनल लाइफ पूरी तरह प्रभावित है। हिंदू कल्चर में रस्में पूरी नहीं कर पाते। परिवार वाले ताने मारते हैं कि घर की बहू समय पर नहीं आ पा रही। उन्होंने बताया कि दो बच्चे हैं, पति इंजीनियर हैं, लेकिन मैं बच्चों को समय नहीं दे पाती।
  • जया ने बताया कि बेटे का कान का पर्दा फट गया था। ढाई-तीन महीने तक उसे हिलने नहीं देना था, मूवमेंट नहीं करनी थी। दस दिनों तक खून बहता रहा, लेकिन मैं अपनी ड्यूटी नहीं छोड़ पाई। खून बह रहा था और मैं दूसरे मरीजों को देख रही थी।

कोविड ने छीना साथी प्रमोशन ने छोड़ा इंतजार

  • आइसीयू कोरोनरी केयर यूनिट में काम करने वाली शिवरती भलावी ठाकुर 18 साल से हमीदिया में हैं। कोविड में उन्होंने पति को खो दिया। उन्होंने बताया कि 14 अप्रैल 2021 को पति अजय सिंह ठाकुर का निधन हुआ। वो भी डॉक्टर थे। मैं कोविड आइसीयू में ड्यूटी कर रही थी, वो भी कोविड मरीज देख रहे थे। त्रिलंगा में रहने वाली शिवरती अब सिंगल मदर है। पांच साल का बेटा है। परिवार के लिए समय नहीं मिल पाता।
  • ससुराल से कोई मदद नहीं मिलती है। वेतन बढ़ता है, लेकिन प्रमोशन नहीं होता है। सैलरी भी न के बराबर बढ़ती है। इसी तरह आइसीयू में काम करने वाली पुष्पा की कहानी भी कम दर्दनाक नहीं। आइवीएफ से बेटी हुई थी, आठ महीने की बच्ची स्टील बर्थ निकली। पुष्पा ने बताया कि बेटी होने में सात-आठ लाख रुपये खर्च किए थे। बच्ची पेट में ही मर गई। इसके बाद भी ड्यूटी नहीं छोड़ी।

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