दतिया उपचुनाव : भ्रष्टाचार पर भाजपा होगी हमलावर, तो कांग्रेस सहानुभूति के भरोसे मैदान में उतरेगी

Updated on 09-07-2026 08:11 PM

भोपाल । वैसे तो मुख्यमंत्री का आकलन राज्य के विकास और जन कल्याणकारी योजनाओं की सफलता में निहित होता है, लेकिन मध्य प्रदेश में डॉ. मोहन यादव के खाते में रहीं चुनावी सफलताएं पार्टी की तरफ से उनके प्रति उम्मीदें बढ़ाती हैं।

मोहन यादव के मुख्यमंत्री रहते हुए ही 2024 के चुनाव में पहली बार भाजपा को मध्य प्रदेश की सभी 29 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल हुई, वहीं बीते दिनों राज्यसभा की तीसरी सीट भी कांग्रेस के हाथों से फिसलकर भाजपा के हाथ लग गई।

अब प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर उपचुनाव सामने है। यहां 2023 में पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा को कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने पराजित किया था, लेकिन दिल्ली की कोर्ट में भ्रष्टाचार के मामले में उन्हें दो साल से अधिक सजा होने के चलते हटा दिया गया और अब रिक्त सीट पर उपचुनाव होना है।
मिश्रा की दावेदारी लगभग तय है। 13 जुलाई तक नामांकन दाखिल होंगे, जबकि 14 जुलाई को नामांकन की छंटनी एवं 16 जुलाई तक नामांकन वापसी होगी। 30 जुलाई को मतदान और तीन अगस्त को मतगणना होगी और नतीजे घोषित होंगे।
दरअसल, दतिया विधानसभा क्षेत्र के उपचुनाव से अकेले नरोत्तम मिश्रा का राजनीतिक भविष्य ही तय नहीं होगा, बल्कि मोहन सरकार की भी एक तरह से परीक्षा होगी। मोहन सरकार ने कार्यकाल का पहला साल महिलाओं के लिए समर्पित किया, वहीं दूसरे साल में निवेश और रोजगार पर बड़े पैमाने पर प्रयास किए गए। 2026 को किसान कल्याण के लिए तय किया गया है, जबकि अगले वर्ष 2027 को युवा वर्ष के रूप में मनाया जाएगा। इन वर्षों में संबंधित वर्गों के कल्याण के लिए जो भी काम हुए हैं, उस पर जनता की मुहर लगना बाकी है।
उपचुनाव के बहाने ही सही, मोहन सरकार के प्रति जनता के मन में संतोष का भाव है या नाराजगी, इसके संकेत मिल सकते हैं। हालांकि भाजपा इसे कोई टेस्ट के बजाय उपचुनाव ही मानकर चल रही है और भ्रष्टाचार के मुद्दे को बड़ा करते हुए कांग्रेस पर हमलावर रहेगी।
दतिया से विधायक रहे राजेंद्र भारती को भ्रष्टाचार के मुद्दे में हटाए जाने से भाजपा इसे ही आगे लेकर चलने की तैयारी में है।
इधर, कांग्रेस के पास सिवाय सहानुभूति बटोरने के कोई रास्ता दिखाई नहीं देता। उपचुनाव के लिए प्रत्याशी तय करने में भी कांग्रेस एक राय नहीं दिखाई दे रही है। वैसे भी जीतू पटवारी को प्रदेश की कमान सौंपे जाने के बाद से कांग्रेस में अलग-अलग गुटों की अपनी-अपनी राहें कई मौके पर स्पष्ट रूप से दिखाई दी हैं।
सदन हो या सड़क पर आंदोलन की तैयारी, कांग्रेस की एकजुटता दिखाई देना अभी बाकी है।
बीते दिनों उज्जैन में मोहन यादव की जमीन को लेकर उठे सियासी बवंडर में कांग्रेस के पास बड़ा मौका था और भोपाल से दिल्ली तक काफी बवाल हुआ, लेकिन इसका पटाक्षेप जिस तरह हुआ, वह खुद कांग्रेस के लिए भी बड़ा सबक है।

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