उमा भारती के 'माई का लाल' वाले बयान से भाजपा में हलचल, क्या 2016 वाली गलती दोहरा रही है पार्टी?

Updated on 30-04-2026 12:20 PM

 भोपाल। जातिगत और क्षेत्रीय राजनीति से ऊपर उठकर भाजपा भले ही नए समीकरण बुन रही हो लेकिन दिग्गजों के बयान उसे दो कदम आगे, फिर 10 कदम पीछे हटने वाली स्थिति में पहुंचा रहे हैं। ताजा मामला पूर्व केंद्रीय मंत्री उमा भारती का है। भोपाल में मंगलवार को राजा हिरदेशाह लोधी की शौर्य यात्रा में उमा भारती द्वारा आरक्षण पर शिवराज सिंह चौहान का बयान दोहराने से भाजपा की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। उन्होंने मंच से कह दिया कि कोई माई का लाल आरक्षण नहीं छीन सकता।

कोई माई का लाल आरक्षण नहीं छीन सकता- उमा भारती

12 जून, 2016 को तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भोपाल में अनुसूचित जाति-जनजाति अधिकारी-कर्मचारी संघ (अजाक्स) के राज्य स्तरीय सम्मेलन में कहा था कि मेरे रहते हुए कोई माई का लाल आरक्षण खत्म नहीं कर सकता, आरक्षण जारी रहेगा और प्रदेश सरकार पदोन्नति में भी आरक्षण देगी। जमकर विरोध हुआ, सपाक्स जैसी पार्टी बनी। नतीजा रहा कि वर्ष 2018 में भाजपा राज्य में सत्ता गंवा बैठी। स्थापना से लेकर कुछ राज्यों में सत्ता तक पहुंचने के दौर में भाजपा सवर्णों की पार्टी मानी जाती थी।

एससी-एसटी को भी खटक सकता है उमा भारती का बयान

सामान्य वर्ग की जगजाहिर नाराजगी के बीच उमा का बयान एससी-एसटी को भी खटक सकता है, क्योंकि इन वर्गों में धारणा है कि ओबीसी को लाभ एससी-एसटी के हितों की कटौती से ही संभव है। आरक्षण के लिए बयान संपूर्ण संबंधित वर्ग को भी पसंद आए, व्यावहारिक तौर पर ऐसा दिखाई नहीं देता। क्रीमी लेयर व्यवस्था न होने से आरक्षित वर्गों में असमानता बढ़ी है।


ऐसे में आरक्षित वर्ग में होकर भी लाभ नहीं पाने वाले नाराज होते हैं। इस बयान ने सामान्य वर्ग को एक बार फिर यूजीसी के विनियम की याद दिला दी है, जिसमें एससी-एसटी या अन्य आरक्षित वर्ग की शिकायत पर ही सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों पर कड़ी कार्रवाई का प्रविधान था। भाजपा अभी यूजीसी के विरोध के प्रभाव को कम करने की कोशिश में ही है, ऐसे में ओबीसी आरक्षण पर बयान सारी मेहनत पर पानी फेरता हुआ दिखाई दे रहा है।

पिछले लोकसभा में भाजपा ने मध्य प्रदेश में जीतीं सभी 29 सीटें

तब तमाम क्षेत्रीय दल जातिगत राजनीति के भरोसे थे, लेकिन केंद्र सरकार में पहुंचते ही भाजपा का झुकाव ओबीसी, दलित और आदिवासी वर्गों पर बढ़ा। भाजपा का थिंक टैंक दृढ़ विश्वास रखता है कि इन वर्गों में पैठ के बिना फिलहाल सत्ता संभव नहीं है। यह देख सामान्य वर्ग पार्टी से दूर होता गया। वर्ष 2024 का लोकसभा चुनाव देखें तो उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे हिंदी भाषी राज्यों में भाजपा की सीटें कम हो गईं, हालांकि मध्य प्रदेश में सभी 29 सीटें मिलीं।

आदिवासी समुदाय के बीच पैठ बढ़ाने की रणनीति पर भाजपा आगे बढ़ी और पहली बार आदिवासी महिला राष्ट्रपति पद तक पहुंचीं, भगवान बिरसा मुंडा को लेकर देशव्यापी कार्यक्रम हुए, स्वतंत्रता आंदोलन के गुमनाम आदिवासी नायकों को देश के सामने लाया गया, तमाम योजनाओं के साथ नामकरण में भी भाजपा सरकारें आदिवासी समुदाय की ओर रुझान रखती हैं। हालांकि आदिवासी समुदाय के भरोसे का हाल है कि झारखंड में सत्ता गंवानी पड़ी, मध्य प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा के बीच आदिवासी ज्यादा अंतर नहीं रखते। छत्तीसगढ़ में भूपेश सरकार की विदाई के बीच समुदाय ने यू-टर्न लिया, वहीं गुजरात में आदिवासी समुदाय पार्टी से दूर हो रही है।


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